बल वे दीवेया लम्बी लाट
दीप ज्योति परब्रह्म: दीप ज्योति जनार्दन:।
दीपोहरते में पापं सांध्य दीपं नमोस्तुते।।
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा।
शत्रुबुद्धि विनाशाय दीपज्योति: नमोस्तुते॥
भारतीय संस्कृति की गरिमा अतुल्य है जो कि आदिकाल से चली आ रही है। हमारी इस संस्कृति की परंपराओं के पीछे तात्विक महत्त्व, वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक रहस्य आवश्य ही छिपा हुआ रहता है। ऐसी ही एक अद्भुद परंपरा है - दीपक प्रज्वलित करने की परंपरा जो कि भारतीय संस्कृति में सदियों से चली आ रही है। हिन्दू धर्म में कोई भी पूजा होम इत्यादि मंगल कार्य में दीपक प्रज्वलित करने की एक अनिवार्य परंपरा है। किसी भी मंगल कार्य की शुरुवात दीपक प्रज्वलित करने से ही की जाती है। दीपोहरते में पापं सांध्य दीपं नमोस्तुते।।
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा।
शत्रुबुद्धि विनाशाय दीपज्योति: नमोस्तुते॥
भारतीय संस्कृति में दीप प्रज्वलन परंपरा
मन भीतर एक दीप आस्था का
दीपक प्रतीक है आस्था का और विश्वास का। दीपक सौभाग्य का एक चिन्ह है। दीपक जीवन में मंगल का प्रतीक है। एक विश्वास मन में रख कर हर घर में और मंदिर में भगवान् के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है कि इस दीपक की यह ऊर्जावान किरणें हमारे मन में जो भगवान् के प्रति गहरी आस्था और भक्ति है, वह हमारे आराध्य देव तक जरुर पहुंचा देंगी।
दीपक प्रज्वलित कर के ही हम अपने आराध्य देवता का आवाहन करते हैं और अपनी पूजा प्रार्थना उन को समर्पित करते हैं। वास्तव में हमारा शरीर पांच तत्वों से मिल कर ही बना है तो जब हम पूजा करते हैं और अपनी प्राथना भगवान तक पहुँचाना चाहते हैं तो हम पूजा स्थान पर जल और अग्नि स्थापित करते हैं क्यूंकि वायु, आकाश और पृथ्वी तत्व तो हर जगह मौजूद हैं। हवन-यज्ञ आदि में डाली गयी आहुति भी अग्नि के द्वारा ही देवी देवताओं तक पहुँचती है।
जब श्री राम चंद्र जी चौदह वर्ष का बनवास काट कर आयोध्या वापिस आये थे तो आयोध्या वासियों ने दीपक जला कर ही अपनी खुशी व्यक्त की थी तथा उनका स्वागत दीपावली का त्यौहार मना कर हर्षोउल्लास से किया था।
हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोग संध्या के समय तुलसी के पौधे तथा पीपल के वृक्ष को भी दीप दान करते हैं जिसके प्रभाव से ग्रह-शांति होती है तथा उन्हें जीवन में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
दीपक प्रज्वलित कर के ही हम अपने आराध्य देवता का आवाहन करते हैं और अपनी पूजा प्रार्थना उन को समर्पित करते हैं। वास्तव में हमारा शरीर पांच तत्वों से मिल कर ही बना है तो जब हम पूजा करते हैं और अपनी प्राथना भगवान तक पहुँचाना चाहते हैं तो हम पूजा स्थान पर जल और अग्नि स्थापित करते हैं क्यूंकि वायु, आकाश और पृथ्वी तत्व तो हर जगह मौजूद हैं। हवन-यज्ञ आदि में डाली गयी आहुति भी अग्नि के द्वारा ही देवी देवताओं तक पहुँचती है।
जब श्री राम चंद्र जी चौदह वर्ष का बनवास काट कर आयोध्या वापिस आये थे तो आयोध्या वासियों ने दीपक जला कर ही अपनी खुशी व्यक्त की थी तथा उनका स्वागत दीपावली का त्यौहार मना कर हर्षोउल्लास से किया था।
हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोग संध्या के समय तुलसी के पौधे तथा पीपल के वृक्ष को भी दीप दान करते हैं जिसके प्रभाव से ग्रह-शांति होती है तथा उन्हें जीवन में शुभ फल की प्राप्ति होती है।
साकारात्मक ऊर्जावान
शिष्य अपने गुरु से प्राथना करते हुए कहता है ---
जोत से जोत जगाओ, सतगुरु जोत से जोत जगाओ
मेरा अंतर तिमिर मिटाओ, सतगुरु जोत से जोत जगाओ।
अर्थात
हे मेरे गुरुदेव ! आप अपने दिये { ज्ञान } की जोत से मेरे दिये { ज्ञान /बुद्धि} को जगाओ और मेरे अन्तर्मन से अज्ञानता का अँधियारा सदा के लिए मिटा कर मेरे जीवन में ज्ञान का उजाला करो।
जोत से जोत प्रार्थना सुनने के लिए क्लिक करें
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बल वे दीवेया लम्बी लाट, ओथे पुखरहीं जित्थे सानु ओखी रात
संध्या काल में अपने घर के मुख्य द्वार पर एक दीप आवश्य ही प्रज्वलित करना चाहिए तांकि राह चलते कोई पथिक अँधेरे मार्ग पर भटक न जाये अथवा उसे कोई कष्ट न हो तथा उस दीप की रौशनी से उसका मार्ग रोशन हो जाये वह अपनी मंजिल तक बिना किसी कष्ट और भय के पहुँच जाये।[आज के आधुनिक युग में यदि आपके पास समय का आभाव है तो उस स्तिथि में मुख्य द्वार पर एक सुन्दर लैंप की व्यवस्था करें। ]
परदोष काल में घर के मंदिर में एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। वह दीपक के तेल में थोड़ा कपूर मिला देने से घर का वातावरण सुगन्धित होता है तथा कपूर के प्रभाव से उस घर के लोगों का स्वस्थ अच्छा होने लगता है।
अमावस की रात को दक्षिण दिशा की और एक दीपक जलना चाहिए। यह दीपक हमारे पितरों को श्रद्धांजिली अर्पित करते हुए जलना चाहिए तांकि परलोक में उनको इस दीपक की रौशनी से अमावस की काली रात में कोई तकलीफ न हो।
इसीलिए दीपक एक संकेत है -उजाले का, रौशनी का, साकारात्मक ऊर्जा का, खुशी का, जीवन का, एक नयी शुरुवात का, शुभ और मंगल का, कष्टों को दूर करने का। भय से मुक्ति का।
ब्रह्मांड को शुभ संदेश भेजने का आयोजन
आओ आज हम मिल कर रात के अंधकार को चीरता हुआ एक सकारात्मक ऊर्जावान दीप प्रज्वलित करें जिसमें आस्था और विश्वास हो, जिसकी ऊर्जावान किरणें ब्रह्मांड में जा कर हमारा शुभ संदेश उस परम शक्ति को दें जिसके प्रभाव से हम सब और सारा विश्व आरोग्य और खुशहाल जीवन का आनंद ले। सकारात्मक तरंगें सब ओर व्याप्त हों, विश्व से नाकारात्मक ऊर्जाएं दूर भाग जायें, चारों तरफ मंगल हो और सभी सुख से रहें।
मैं आप सब के अच्छे स्वस्थ और सुखी जीवन की मंगल कामना करती हूँ। आप सब के जीवन में खुशियों से भरा एक मंगलमय दीपक सदा ही प्रज्वलित रहे।
मैं आप सब के अच्छे स्वस्थ और सुखी जीवन की मंगल कामना करती हूँ। आप सब के जीवन में खुशियों से भरा एक मंगलमय दीपक सदा ही प्रज्वलित रहे।
मधुर मधुर मेरे दीपक जल!
मधुर मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!
सीमा की लघुता का बंधन,
सौरभ फैला विपुल धूप बन,
मृदुल मोम -सा सा घुल रे,
मृदु-तन! दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,
मृदुल मोम -सा सा घुल रे,
मृदु-तन! दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल,
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!
तारे शीतल कोमल नूतन,
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं,
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं,
हाय, न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!
जलते नभ में देख असंख्यक,
स्नेह-हीन नित कितने दीपक,
जलमय सागर का उर जलता;
स्नेह-हीन नित कितने दीपक,
जलमय सागर का उर जलता;
विधुत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल !
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल !
द्रुम के अंग हरित कोमलतम,
ज्वाला को करते ह्रदयंगम,
वसुधा के जड़ अन्तर में भी,
ज्वाला को करते ह्रदयंगम,
वसुधा के जड़ अन्तर में भी,
बन्दी है तापों की हलचल;
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!
मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भयकर!
मैं आँचल की ओट किये हूँ!
सुभग न तू बुझने का भयकर!
मैं आँचल की ओट किये हूँ!
अपनी मृदु पलकों से चंचल,
सहज-सहज मेरे दीपक जल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!
सीमा की लघुता का बंधन,
हैअनादि तू मत घड़ियां गिन,
मैं द्रिग के अक्षय कोषों से,
तुझमें भरती हूँ आँसू जल! सहज-सहज दीपक मेरे जल!
तुम असीम तेरा प्रकाश चिर, खेलेंगे नव खेल निरंतर, तम के अणु-अणु में विधुत सा, अमिट चित्र अंकित करता चल,
सरल-सरल मेरे दीपक जल !
तू जल-जल जितना होता क्षय; यह समीप आता छलनामय; मधुर मिलान में मिट जाना तू, उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
प्रियतम का पथ आलोकित कर ! मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
(कवियत्री -महादेवी वर्मा )
(कवियत्री -महादेवी वर्मा )



Wonderful info sonia
ReplyDeleteBahut khub!
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