शरद पूर्णिमा
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल मे, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥
मैथिलीशरण गुप्त
शरद पूर्णिमा एक उत्सव
पौराणिक मान्यताएं एवं शरद ऋतु, पूर्णाकार चंद्रमा, संसार भर में उत्सव का माहौल। इन सबके संयुक्त रूप का यदि कोई नाम या पर्व है तो वह है 'शरद पूनम'। वह दिन जब इंतजार होता है रात्रि के उस पहर का जिसमें 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा अमृत की वर्षा धरती पर करता है। वर्षा ऋतु की जरावस्था और शरद ऋतु के बाल रूप का यह सुंदर संजोग हर किसी का मन मोह लेता है। प्राचीन काल से शरद पूर्णिमा को बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। शरद पूर्णिमा से हेमंत ऋतु की शुरुआत होती है। इसके महत्व और उल्लास के तौर-तरीकों के संबंध में शरद पूनम का महत्व शास्त्रों में भी वर्णित है।
आश्विन नक्षत्र
अश्विनी महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है तथा एक महीने में चंद्रमा जिन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें ये सबसे पहला है और यह आश्विन नक्षत्र की पूर्णिमा आरोग्य देती है।
केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूरण होता है और पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट भी होता है। पृथ्वी से निकट होने के कारण चंद्रमा आकार में बड़ा भी दिखाई देता है। मान्यता है कि चंद्रमा अपनी किरणों से इस पूर्णिमा वाली रात को पृथ्वी पर अमृत बरसता है।
चंद्रमा एक औषधीष
प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधीश यानी औषधियों का स्वामी कहा गया है। आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार सोम या चंद्रमा से जो सुधामय तेज पृथ्वी पर गिरता है उसी से औषधियों की उत्पत्ति हुई और जब औषधी 16 कला संपूर्ण हो तो अनुमान लगाइए उस दिन औषधियों को कितना बल मिलेगा। आयुर्वेदाचार्य इस रात को जीवनदायिनी रोगनाशक जड़ी-बूटियों को शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई इन जड़ी-बूटियों से जब दवा बनायी जाती है तो वह रोगी के ऊपर तुंरत असर करती है। एक अध्ययन के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती है।सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।
चंद्रमा को वेद पुराणों में मन के समान माना गया है "चंद्रमा मनसो जात: " अर्थात चन्द्रमा का हमारे मन से सीधा कनेक्शन है। चंद्रमा ही मनुष्य के मन को बल देता है तथा भावुक भी चंद्रमा ही करता है। सदियों से कवियों की कल्पना में चाँद और चाँदिनी की व्याख्या का वर्णन मिलता है क्यूंकि कवी की कल्पना भी मन से ही जुड़ी होती है। मन से सम्बंधित वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक भी बताया गया है। हमारे शरीर का अदिक्तम हिस्सा जल है इसीलिए चन्द्रमा का हम सब के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है।शास्त्रो के अनुसार इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है। रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मानव को मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं। अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारिशोध के अनुसार इस खीर को एक विशेष विधि से बनाया जाता है। इस को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। पूरी रात चांद की चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट यह खीर खाने से सभी रोग दूर होते हैं, शरीर निरोगी होता है। इसीलिए शरद पूर्णिमा की रात कई जगहों पर खीर का वितरण होता है। ये खीर स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। रोगी रोगमुक्त भी होता है। इसके अलावा खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी है। ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का जो संचय हो जाता है, शरद पूर्णिमा की शीतल धवल चांदनी में रखी खीर खाने से पित्त बाहर निकलता है।
शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। स्वयं सोलह कला संपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है यह पूर्णिमा। इस रात को अपनी राधा रानी और अन्य सखियों के साथ श्रीकृष्ण महारास रचाते हैं। कहते हैं जब वृन्दावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव-विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी। वृंदावन के निधिवन के संबंध में कहा जाता है कि आज भी यहां श्रीकृष्ण और गोपियां रास रचाती हैं। गुजरात और मणिपुर में श्री कृष्ण भक्त भी शरद पूर्णिमा को रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं।
देवी लक्ष्मी का पूर्णिमा भ्रमण
वर्ष के बारह महीनों में ये पूर्णिमा ऐसी है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। इस पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, तो धन की देवी महालक्ष्मी रात को ये देखने के लिए निकलती हैं कि कौन जाग रहा है और वह अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन-धान्य से भरपूर करती हैं।
कौन जाग रहा है - कोजागरी
शरद पूर्णिमा को कोजागौरी लोक्खी (देवी लक्ष्मी) की पूजा की जाती है। शरद पूर्णिमा के संबंध में मान्यता है कि रात में देवी लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करती हैं और भक्तों से पूछती हैं कौन जाग रहा है? इसीलिए इसे "कोजागरी पूर्णिमा" भी कहते हैं। पूजा में लक्ष्मीजी की प्रतिमा के अलावा लक्ष्मी यन्त्र, मेरु, जल से भरा कलश, धूप, दुर्वा, कमल का पुष्प, हर्तकी, कौड़ी, आरी (छोटा सूपड़ा), धान, सिंदूर, शृंगार, चुनरी, नारियल , प्रासाद अथवा लड्डू प्रमुख होते हैं। इसमें रंगोली और उल्लू ध्वनि का विशेष स्थान है। जहां तक बात पूजन विधि की है तो नारद पुराण के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा को प्रातः स्नान कर उपवास रखना चाहिए। इस दिन पीतल, चांदी, तांबे या सोने से बनी लक्ष्मी प्रतिमा की विभिन्न विधियों द्वारा देवी पूजा करनी चाहिए। लक्ष्मी देवी का मंत्र जाप स्फटिक की माला से कर सकते हैं। लक्ष्मी देवी का पूजन भगवान् विष्णु जी के साथ करने से अति शुभ फल मिलता है। देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा के लिए ये तिथि बहुत खास है तथा इस रात की पूजा का विशेष महत्व बताया है।इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा भी की जाती है। इसके पश्चात रात्रि को चंद्र उदय होने पर घी के 101 दीपक जलाने चाहिए। दूध से बनी हुई खीर को बर्तन में रखकर चांदनी रात में रख देना चाहिए।कुछ समय बाद चांद की रोशनी में रखी हुई खीर का देवी लक्ष्मी को भोग लगाकर उसमें से ही ब्राह्मणों को प्रसादस्वरूप दान देना चाहिए। अगले दिन माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए और व्रत का पारणा करना चाहिए।
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पश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो महालक्ष्मी का पूजन भाव विभोर हो कर करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। माँ लक्ष्मी उनके घर धन धान्य से भरपूर करती हैं। चाहे पूर्णिमा किसी भी वक्त प्रारंभ हो पर पूजा दोपहर 12 बजे बाद ही शुभ मुहूर्त में होती है।
इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा करें। भगवन शिव ने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया है इस लिए शरद पूनम पर शिव पूजन का महत्व बढ़ जाता है। शिवलिंग पर चांदी के लोटे से दूध चढ़ाएं। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पण करें "शिव पूजामं करिष्यामि एक बिल्वम शिवार्पणम " शिव भगवन को मंदार पुष्प बहुत पसंद हैं। "मंदार पुष्प बहुपुष्प सपूजिताये" अर्थात बहुत से मंदार के पुष्पों से भगवन शिव का पूजन करना चाहिए और दीपक जलाकर "ऊँ नम: शिवाय" मंत्र का जाप करें। मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग करना चाहिए। भगवन शिव को खीर का भोग लगाना न भूलें।
कुमार कार्तिके पूर्णिमा
ओडिसा में शरद पूर्णिमा को "कुमार पूर्णिमा" के नाम से मनाया जाता है। आदिदेव महादेव और देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर, बलवान कार्तिकेय जी की पूजा कुंवारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती हैं।
महाज्ञानी पंडित एवं महान शिव भक्त रावण का शरद पूर्णिमा स्नान
लंकाधिपति रावण एक महाज्ञानी तथा बहुत बड़ा शिव भक्त था। रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी।
इसीतरह से प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय पूर्णिमा स्नान उपयुक्त रहता है।चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। शरीर के रोग नाश होते हैं।
यदि संभव हो तो सुबह नदी में स्नान करें। पूर्णिमा की रात्रि को जब पूरी रात नदी के जल में पूर्णिमा की शीतल किरणे पड़ती हैं तो नदी का जल चंद्रमा की उन शीतल रश्मियोँ से औषधीय हो जाता है जिसमें स्नान करने से शरीर के रोग और कष्ट दूर होते हैं। और अगर नदी में स्नान संभव न हो सके तो आप अपने घर की खुली छत पर जहाँ पूरी रात चंद्रमा की रौशनी रहे वहाँ रात को एक खुल्ले टब में जल भर कर रखें तथा सुबह उस जल से स्नान करने से भी लाभ होगा।
शरद पूर्णिमा पर दान का विशेष फल
इस दिन कंबल, ऊनी वस्त्रों, सफ़ेद चीजों और अन्न का अपने सामर्थ्य के अनुसार दान का दान करें। तथा ब्राह्मण और किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं। शरद पूर्णिमा पर किये गए दान का विशेष फल प्राप्त होता है।
यदि आप अपनी आँखों की रौशनी को बढ़ाना चाहते हैं तो इस रात्रि को चन्द्रमा की ओर त्राटक करें तथा चंद्रमा की रौशनी में सुई में धागा पिरोयें। यह एक प्राचीन विश्वास है ऐसा करने से आँखों की रौशनी तेज होती है तथा आंखे स्वस्थ होती हैं। इसके पीछे यही विज्ञान है कि चन्द्रमा की रौशनी का एकटक उपयोग करते हुए आप चंद्र देवता से जो सोमरस पृथ्वी पर बरस रहा है, आप अपनी आँखों से उस सोमरस की ऊर्जा को प्राप्त करेंगे।
यह लेख शरद पूनम की रात्रि को चन्द्रमा की शीतल किरणों में बैठ कर लिखा गया है, मैं आशा करती हूँ कि इस लेख के द्वारा शरद पूनम के चाँद की शीतल रश्मियों की Cosmic Spiritual Healing Vibrations आप तक पहुँच जाएँ।











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